Tuesday, June 23, 2015

मेरी लेखनी


मेरी लेखनी
उसी के लिए
विष वमन करती है
जिसे मैं
पसंद नहीं करता
फिर चाहे वो
मोदी जी हों
या उनके
काम करने या
बदला लेने का तरीका ,
मै केजरीवाल को भी
पसंद नहीं करता
पर उनकी ईमानदारी
और भ्र्ष्टाचार को
रोकने की प्रवर्ति की
सराहना करते हुए भी
कभी नहीं थकता 
उनकी प्रसिद्धि
दिन दूनी रात चौगुनी
बढ़ना हैं है नतीजा ,
मुझे कांग्रेस से भी
शिकवा नहीं है
पर कांग्रेस के
अहंकारी और दम्भी
बेईमान नेताओं से
सदैव ही रहा है शिकवा
आज जो कांग्रेस के
बुरे हालात हुए हैं
ये भ्र्ष्टाचारी नेताओं के
किये कर्मों का है नतीजा  |




Monday, June 8, 2015

जांच परख

कश्ती में  बैठने से पहले
सौ बार सोचता है
 कहीं कश्ती मझदार में
डूब तो नहीं जाएगी
मिटटी की सुराही
खरीदता है तो
ठोक बजाकर देखता है
जल से फ़ूट तो नहीं जाएगी
एक बकरी खरीदता है
तो टांग उठाकर देखता है
दूध देने के वक्त
कहीं लात तो नहीं जायेगी ,
शादी करने के वक्त
खानदान नहीं देखता
देखता है मात्र दहेज़ की राशि
क्योँकि वो ही तो काम आएगी |
हम तो छोड़कर
जाने वाले थे प्रिये
पर तुमने मेरा दामन
अश्रुओं से  भर दिया ,
उसे निचोड़कर
सुखाने की फ़िराक में
हम तुम्हें छोड़कर
जाना ही भूल गये   |

Saturday, June 6, 2015

पुरानी यादें

नाचीज  ने
गुलाब ऐ फूल 
नजराना दिया था
मुहब्बत की देहली पर
तुमने भी उसे
चूमकर ,दिल से लगा
चुप चाप रख लिया था
पुस्तक में छुपाकर ,
मैं नहीं जानता
कैसे रखा होगा उसे
कभी बात करती होगी
या अहसास भी
कराती होगी बार बार 
अपने स्पंदन का
आगोश में छिपा या
गात से लगा लगा कर,


Wednesday, June 3, 2015

रिश्ते नाते



मैंने रिश्तों को सदैव  ही
ग्रहण लगते हुए  देखा है
पर चांदनी में नहाती हुई
कभी पूनम  की रात ना देखी,
धन ऐश्वर्य हो जाने पर
अहंकार को बहुतं देखा है
एक दुसरे से प्रतिबद्ध तो है 
पर नम्रता पूर्वक बात ना देखीं ,
ह्रदयों में अंगारे सुलगते हैं
पर सावन की बरसात ना देखी
भादों की उमस भरी रात देखी हैं
पर माघ की बर्फीली रात ना देखी|




उपदेश

रुसवाई करने से
कभी कुछ नहीं मिलता
जी लेते हैं अधिक वो
जो कभी रुस्वा नहीं होते ,
हंसी तो कुदरत की देन है
बाँट दे  अपनी समझकर
भण्डार खत्म नहीं होगा
सर्वस्व अपना भी लुटाकर 


Tuesday, June 2, 2015

मैं कुछ भी नहीं हूँ फिर भी कुछ तो हूँ

मैं कंकर भी नहीं हूँ
पत्थर भी नहीं हूँ
पर किसी पर्वत से
कम भी नहीं हूँ ,
मैं वृक्ष भी नहीं हूँ
और काष्ठ भी नहीं हूँ
पर चन्दन के तरु से
कम भी नहीं हूँ ,
मैं पक्षी भी नहीं हूँ
पशु  भी  नहीं हूँ
परन्तु शेर जैसे साहसी से
कम भी नहीं हूँ ,
मैं जल भी नहीं हूँ
और झील भी नहीं हूँ
पर समुन्द्र जैसे जलाशय से
 कम भी नहीं हूँ ,
मैं जीव भी नहीं हूँ
निर्जीव भी नहीं हूँ
पर जीवन रक्षा करने वाले से
कम भी नहीं हूँ ,
मैं दानी भी नहीं हूँ
दाता भी नहीं हूँ
पर प्रण निभाने वालों से
कम भी नहीं हूँ ,
मैं धरा  भी नहीं हूँ
आकाश भी नहीं हूँ
पर दोनों को मिलाने वालों से
कम भी नहीं हूँ ,
मैं साधू भी नहीं हूँ
ज्ञानिं भी नहीं हूँ
पर उपदेश देने वालों से
कम भी नहीं हूँ,
मैं क्या हूँ और
क्या कुछ नहीं हूँ
पर आप जैसे मित्रों को
मनाने में भी कम नहीं हूँ ,
आप मुझे कुछ भी समझे
मैं उसी में खुश  हूँ
यदि आप मेरे कृष्ण ,राम  है
तो मैं आपका सुदामा ,हनुमंत हूँ |




















Monday, June 1, 2015

मैं मिटटी ही तो हूँ

मैं जिससे बना
जिस गगरी में रहा
कारावास के समय
प्रति पल जो चाहा
 सब मिलता रहा
और मेरी शवांस
जीवित रहीं
पैदा  होने की आस में  ,
जिसमे रहकर
मैं विचरण करता रहा
आमोद प्रमोद करता रहा
उसके दिए फलों को
सदैव भोगता रहां
जीवन की गहराइयों को
भली भांति विचार कर
मोक्ष पाने की आस में ,
एक दिन उसी में
मिल जाऊंगा
ढूंढते रहना मुझे
मैं राख हो जाऊंगा
फिर ना वापसआऊंगा
क्योँकि मैं सशरीर
पंचतत्वों में सदैव हेतु
विलीन हो जाऊंगा |



जमात

गधों के भी कभी
सींग हुआ करते थे
पर खुदा ने एक दिन
उनको नेस्तनाबूद कर दिया
क्योँकि गधों की जमात में
आदमी पैदा होने लगे थे |