Sunday, March 29, 2015

इश्क़ ही करना है तो
अपनी जोरू से करके देखिये
माशुका बन जायेगी तुम्हारी
तुम्हे अपना आशिक़ समझकर
तोड़ देगी सारे रश्मो रिवाज
तुम्हें अपना मजनू बनाने के लिए  
भीड़ जाएगी  सारी दुनिया से
तुम्हारी लैला कहलवाने के लिए |

Saturday, March 28, 2015

इश्क़ एक जूनून है
इसके पट ना खोलिए
जो भी मजनू बन गया
उसके बर्तन बिक लिए
माशुकाओं के चक्कर में पड़
कितने ही अंदर हो लिए
बचे खुचे जो रह गए
वो  सब कब्रों में सो लिए |

दादा साहब फाल्के पुरस्कार और भारत रत्न

मैं आज तक एक बात नहीं समझ पाया "दादा साहेब फाल्के पुरस्कार "आखिर तभी क्यों दिया जातां है जब की वो या तो मृत्यु को प्राप्त कर चूका होता है अथवा मरणासन्न स्तिथि में होता है या फिर उसके जीवन के अंत में  कुछ ही दिन बाकी होते हैं |
क्या इसके पीछे भी कोई लॉजिक है ,
या जो पुरस्कार राशि दी जाती है वो उसके हर्ज मर्ज में काम आ जाए ,
या यदि उस पुरस्कार वाले व्यक्ति ने अपनी अगली पीढ़ी के लिए कुछ नहीं छोड़ा तो अंतिम समय सरकार धन राशि देकर उनके लिए कुछ छोड़ जाने की अभिलाषा को पूर्ण कर देती है ,
या फिर उस व्यक्ति पर कुछ कर्जा वगेरह चढ़ा हो तो वो उसे चुकाकर आराम से मृत्यु के प्राप्त कर सके ,
या फिर तत्कालीन सरकार ये पुरस्कार देकर खुद को गौरान्वित करने का प्रयत्न करती है ,
या सतकर्म करने वालों को उसके बदले में कुछ कर देने का दम्भ भरने के लिय ऐसा कुछ करती है |
इसी प्रकार से' भारत रत्न "का खिताब देने में भी कुछ कुछ ऐसा ही करती है ,अभी कल आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी को भारत रत्न से नवाजा गया वो भी उनके घर जाकर ,यद्यपि ये एक अच्छा कदम है की एक अच्छे व्यक्ति को सम्मान उसके घर जाकर भी दिया जा सकता है ,परन्तु जब आदरणीय महामहिम प्रणव मुखर्जी उनको भारत रत्न प्रदान कर रहे थे तो शायद उनको ये भी पता नहीं था की उनके साथ क्या हो रहा है ,नाही वो कुछ बोल रहे थे और नाही कुछ शायद देख भी रहे थे उनकी ग्रीवा एक तरफ को झुकी हुई थी अब ऐसे पारितोषिक का भी क्या लाभ की प्राप्त करने वाले को पता ही न लगे ,यदि ये पुरस्कार उनको अब से ५ या १० वर्ष पहले दे दिया जाता तो उसके प्राप्त करने का आनंद ही कुछ और होता ,चलो देर आये दुरुस्त आये .
पर में देश के कर्णधारों से प्रार्थना करूँगा की वो दादा साहेब फाल्के अथवा भारत रत्न जिन महानुभावों को भी प्रदान करे कृपया समय के रहते ही दे दें अथवा ऐसी बुरी स्तिथि में देने का कोई फायदा नजर नहीं आता क्योँकि अक्सर मैनें ऐसे महानुभावों को पुरस्कार प्राप्त करते ही कुछ ही समय के अंतराल में स्वर्गवासी होते देखा है जिसके कारण मेरा ह्रदय प्लावित होता है |






Friday, March 27, 2015

सूक्ष्म दृष्टि

मैं रोता रहा
वो हँसते रहे
वो जख्म देते रहे
मैं हँसता रहा ,
वो गम देते रहे
मैं भुलाता रहा
वो आंसू देते रहे
मैं पीता रहा ,
मैं श्रम करता रहा ,
वो उदरपूर्ति करते रहे ,
मैं लाता रहा
 वो लगाते रहे ,
मैं भाई कहता रहा
वो दुश्मन समझते रहे
मैं जलता रहा
वो जलाते रहे ,
मैंने मंदिर बनाया था
वो शमशान बनाते रहे
मोहवश मैं दबता रहा
वो दबाते रहे ,
मैंने कुछ  बोला
वो टालते  रहे 
मैं सुख देता रहा
वो मुझे सताते रहे ,
मैं दुलार करता रहा
वो दुश्मनी निभाते रहे
मैं उनको दूध पिलाता रहा
वो मेरे बच्चों को
विष पिलाते रहे |














Friday, March 20, 2015

अंतर

सभी अनभिज्ञ हैं
कि क्या लुप्त है                                                                          
भविष्य के गर्भ में                        
सभी स्वयं के                             
अनुमान लगाते हैं                      
सदैव इस संदर्भ में |

         दो 
जो कभी असत्य था
आज वो सत्य क्योँ है
जो कभी  सत्य था
वो आज असत्य क्योँ है
क्या कोई मुझे बताएगा
सत्य और असत्य में   
अंतर क्या है            

Thursday, March 12, 2015

भलाई

"भला करने वाले तू भलां किये जा
भलाई  के बदले बुराई लिए जा ,"
जी हाँ ,आप जिस किसी का भी भला कर रहे हैं और वो आपकी भलाई का अहसान भी नहीं मानता तो कोई बात नहीं आप अपने मार्ग पर प्रसस्त रहिये और उससे आकांक्षा भी मत करिये ,तो समाज ऐसे लोगों को अहसान  फरामोश कहता है ,और" अहसान फरामोश को तो भगवान नरक में भी स्थान नहीं देता ,जिसके कारण उसको इसी  पृथ्वी पर भूत प्रेत या पिशाच बन कर ही रहना पड़ता  है और जन्म जन्मों तक भटकता रहता है ,और हाँ एक बात और ,
यद्यपि वो व्यक्ति शारीरिक तौर पर या अहंकार वश आपके भले कार्य की ना तो उचित तरीके से प्रशंसा करता है और नाही उसे स्वीकारता  है परन्तु उसकी अंतरात्मा सदैव उसको अच्छा या भला ही स्वीकारती है तो जिसके कारण आपको लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती है ,
और उसकी आत्मा सदैव उसे धिक्कारती रहती है जिसके कारण वो शमन या शन्ति को भी प्राप्त नहीं होता |
याद रखिये भले काम का नतीजा भी भला ही होता है | 

Monday, March 2, 2015

नाइंसाफी

जीते जी जिस बन्दे को लोग
झूठा ,बेईमान ,ठग ,धोखेबाज कहते हैं ,
मृत होने पर उसके मुर्दे शरीर को
रस्ते भर झुक झुक कर आदाब करते हैं ,
दफनाते या जलाये जाते वक्त में
दुनिया भर का नायाब इंसान कहते हैं ,
या खुदा ये कैसा इंसाफ है तेरे बन्दों का
जो जिन्दों से ज्यादा मुर्दों का ख्याल रखते हैं |