Thursday, January 28, 2016

प्रकृति से खिलवाड़ मानव की विवशता भी है

मानव अपनी
समग्र और
अति आवश्यक
इच्छाओं की पूर्ती हेतु
पृथ्वी वा प्रकृति को
वैधव्यता प्रदान करना
उसकी विवशता है
क्योँकि कि
वो वस्तु के अभाव में
रोटी सेंक नहीं सकता
यथोचित शास्त्रार्थ
प्राप्त नहीं कर सकता
पुष्प वा फल या
अन्न ,जल को
सुंगने  या चखने से 
उदर भर नहीं सकता
लकड़ी के बिना
अट्टालिकाओं के
दरवाजे बना और
लगा नहीं सकता
फिर इन सभी के हेतु
वो कुछ भी कर सकता है
किसी का उजाड़
किसी का संहार
पर त्याग नहीं कर सकता |

Tuesday, January 19, 2016

मृत्यु

वो जब भी
जिसके निकट जाती है
उसकी अंत:स्तिथि का
अवलोकन कर
म्नस्तिथि को
वश में कर
स्वांशों की गति को
अवरुद्ध कर
बुद्धि का विनाश कर
शरीर स्तिथि को
निश्चेष्ट कर
आत्मा को
आत्मविभोर कर
तृष्णा को मिटा
क्षुधा का विलोप  कर
अर्धमूर्छित होनें का
मात्र आभास कराती है
और बड़ी शान्ति से
सर्वस्व तक
आँचल में समेट 
चुपचाप खिसक जाती  है |


प्रतीक

नैमिषारण्य में
नैसर्गिक आनंद की
अनुभूति ,
ह्रदय पटल पर
उक्रित चित्रकारी की
वक्रित लकीरें ,
मनोमालिन्य पर
सानिंध्य हेतु
उन्मादित सुगंधित समीर ,
कैनवास पर थिरकती
नृत्य करती
मुस्कुराती अधबनी तस्वीर ,
जिसकी समीपता से
सौंदर्यता से
ओतप्रोत होता प्राचीर ,
धरा को भी
सुशोभित करता
स्वेदाम्बु होता अधीर
शशि को स्पर्श  हेतु
पूर्णिमा को
प्रयासरत क्षीर नीर |