Saturday, June 6, 2015

पुरानी यादें

नाचीज  ने
गुलाब ऐ फूल 
नजराना दिया था
मुहब्बत की देहली पर
तुमने भी उसे
चूमकर ,दिल से लगा
चुप चाप रख लिया था
पुस्तक में छुपाकर ,
मैं नहीं जानता
कैसे रखा होगा उसे
कभी बात करती होगी
या अहसास भी
कराती होगी बार बार 
अपने स्पंदन का
आगोश में छिपा या
गात से लगा लगा कर,


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