Monday, June 1, 2015

मैं मिटटी ही तो हूँ

मैं जिससे बना
जिस गगरी में रहा
कारावास के समय
प्रति पल जो चाहा
 सब मिलता रहा
और मेरी शवांस
जीवित रहीं
पैदा  होने की आस में  ,
जिसमे रहकर
मैं विचरण करता रहा
आमोद प्रमोद करता रहा
उसके दिए फलों को
सदैव भोगता रहां
जीवन की गहराइयों को
भली भांति विचार कर
मोक्ष पाने की आस में ,
एक दिन उसी में
मिल जाऊंगा
ढूंढते रहना मुझे
मैं राख हो जाऊंगा
फिर ना वापसआऊंगा
क्योँकि मैं सशरीर
पंचतत्वों में सदैव हेतु
विलीन हो जाऊंगा |



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