Tuesday, April 30, 2013

शब्दों की अपनी माया

कविताएं बन जाते हैं शब्द
कवियों की वाणी से निकलने वाले
नीतियाँ बन जाते हैं शब्द
चाणक्य की तेजस्वी वाणी से निकलने वाले
ग्रन्थ और गीता बन जाते हैं शब्द
मनीषियों की वाणी से निकलने वाले
आशीर्वाद बन जाते  है शब्द
साधू संतों की वाणी से उध्रत होने वाले
पुन्य और प्रताप देते हैं शब्द
माँ बाप के ह्रदय से निकलने वाले
देव तुल्य बना देते हैं शब्द
योगियों की झोली से निकलने वाले
मुर्ख को बुद्धिमान बना देते हैं शब्द
गुरुजनों की सेवा से निकलने वाले
महाराजा हरिश्चंद्र बन जाते है
अपने दिए हुए सत्य शब्दों का पालन करने वाले
यम के द्वार से भी वापस ले आते हैं शब्द
सती सावित्री के अश्रुओं से निकलने वाले 
राजा महाराजा बना देते हैं शब्द
जनता जनार्दन के ह्रदय  से निकलने वाले |

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